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आश्वासन के बदले विराम, अब इको गार्डन में होगा आमरण संग्राम
(युगाधार समाचार)
👉”सीतापुर से लखनऊ तक: भूख हड़ताल का अगला पड़ाव इको गार्डन”
सीतापुर-जनपद वर्तमान समय में एक गहरे प्रशासनिक संकट से गुजर रहा है, जहाँ आंगनबाड़ी भर्ती प्रक्रिया में सामने आए व्यापक भ्रष्टाचार और अनियमितताओं ने न केवल अभ्यर्थियों का विश्वास तोड़ा है, बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर भी गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। सैकड़ों महिला अभ्यर्थियों द्वारा आंगनबाड़ी भर्ती में हुई धांधलियों के विरोध में किए गए आमरण अनशन ने पूरे जनपद को आंदोलित कर दिया। यह अनशन समाजसेवी पुष्पेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व एवं संघर्षशील अभ्यर्थियों की दृढ़ता का परिणाम था। अंततः उप जिलाधिकारी सदर द्वारा दिए गए लिखित आश्वासन के बाद यह भूख हड़ताल 30 घंटे बाद समाप्त हुई। किंतु चेतावनी दी गई कि यदि एक सप्ताह के भीतर समाधान नहीं हुआ, तो आंदोलन की अगली कड़ी लखनऊ के इको गार्डन और मुख्यमंत्री आवास पर आमरण अनशन के रूप में होगी।
अभ्यर्थियों का आरोप है कि चयन प्रक्रिया में पूर्णतः पारदर्शिता की कमी रही। मेरिट, नियम और आरक्षण का घोर उल्लंघन करते हुए अपात्र और अयोग्य व्यक्तियों को प्राथमिकता दी गई। कई अभ्यर्थियों ने यह भी दावा किया कि उन्हें जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि वे सभी मानकों पर खरे उतरते थे। कसमंडा, सिधौली, मिश्रिख, हरगांव, बिसवां जैसे विकास खंडों से रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप सामने आए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल ऑडियो क्लिप और दस्तावेज़ों में यह स्पष्ट है कि चयन में भारी लेन-देन और धमकियों का सहारा लिया गया। यह न केवल असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रणाली की सड़ांध को भी उजागर करता है ग्राम मनवा में एक अभ्यर्थी को विधवा बताकर चयनित कर दिया गया, जबकि ग्राम प्रधान ने उसे अविवाहित प्रमाणित किया है। वहीं सिधौली की एक चयनित अभ्यर्थी प्राची विश्वकर्मा के पति पहले से सरकारी शिक्षक हैं, बावजूद इसके उन्हें ‘आर्थिक रूप से कमजोर’ कोटे में रखा गया – यह स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है। आवेदिका शीला रावत की वायरल कॉल रिकॉर्डिंग में प्रशासनिक अमले की धमकियाँ सुनाई दी गईं। इसके बावजूद आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे यह प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है।
जनता की प्रमुख माँगें स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच – लोकायुक्त, सतर्कता आयोग या न्यायिक एजेंसी द्वारा पूरी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए। RTI के माध्यम से जानकारी सार्वजनिक की जाए – आवेदन पत्र, मेरिट सूची, चयन मापदंड और मूल्यांकन प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए। दोषियों पर कार्रवाई – जिन अधिकारियों व कर्मचारियों पर गंभीर आरोप हैं, उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज की जाए और उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए। भर्ती प्रक्रिया को निरस्त कर पुनः निष्पक्ष प्रक्रिया लागू की जाए – जिससे योग्य, मेहनती और ईमानदार अभ्यर्थियों को न्याय मिल सके। प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाए – “शासनादेश का कोई मतलब नहीं” जैसे कथन देने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो।
यह संघर्ष केवल नौकरी की लड़ाई नहीं है, यह लोकतंत्र की आत्मा – न्याय, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व – की रक्षा का संग्राम है। महिला अभ्यर्थियों का शांतिपूर्ण आमरण अनशन इस बात का प्रतीक है कि समाज अब चुप नहीं बैठेगा। यदि शासन ने इसे हल्के में लिया, तो यह आंदोलन लखनऊ की सड़कों पर न्याय की ज्वाला बनकर फूट पड़ेगा। प्रशासन के लिए यह अवसर है कि वह अपनी छवि को बचाते हुए समय रहते निर्णय ले और ईमानदार अभ्यर्थियों को न्याय दिलाए। अन्यथा यह जनांदोलन समूचे प्रदेश में लोकतांत्रिक चेतना का विस्फोट बन सकता है – और तब यह केवल शासन नहीं, पूरी व्यवस्था को झकझोर देगा। क्योंकि जब आवाजें अनसुनी होती हैं, तब क्रांतियाँ जन्म लेती हैं।












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