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इस्लामाबाद: पाकिस्तान की सियासत और फौज एक बार फिर बड़े फैसले पर पहुंची है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की टॉप सिविल और मिलिट्री लीडरशिप ने 10 साल का स्ट्रैटेजिक पावर प्लान फाइनल कर लिया है. इस मीटिंग का मकसद था- सिस्टम को बिना रुकावट आगे बढ़ाना और देश में लंबी अवधि तक राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना. सूत्रों के अनुसार, यह अहम बैठक PML-N सुप्रीमो नवाज शरीफ के मुर्री स्थित फार्महाउस में हुई. इसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज, आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर और ISI चीफ लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक मौजूद थे.
बैठक में सर्वसम्मति से फैसला लिया गया कि असीम मुनीर को आर्मी चीफ के तौर पर 5 साल का एक्सटेंशन दिया जाएगा. मुनीर का मौजूदा टर्म 28 नवंबर 2025 को खत्म हो रहा है. 2022 में उन्हें तीन साल के लिए नियुक्त किया गया था, लेकिन अब पाकिस्तान आर्मी एक्ट में बदलाव के जरिए उनकी कुर्सी पक्की करने की तैयारी है. संभव है कि वह 2035 तक एक्सटेंशन के जरिए सेना प्रमुख बने रहें. यानी बिना तख्तापलट के वह सत्ता संभाल सकते हैं. सूत्रों ने यह भी बताया कि सरकार इस एक्सटेंशन को कानूनी चुनौती से बचाने के लिए संवैधानिक सुरक्षा देने पर विचार कर रही है.
सिस्टम में हो रहा बड़ा बदलाव
पाकिस्तान के इस पावर प्लान का एक और अहम हिस्सा है ‘हाइब्रिड सिविल-मिलिट्री सिस्टम’ यानी बड़े फैसले, खासकर टॉप मिलिट्री पोस्टिंग, अब राजनीतिक और फौजी लीडरशिप की आपसी सहमति से ही होंगी. DG ISI, DG मिलिट्री इंटेलिजेंस और DG-C (काउंटर इंटेलिजेंस) जैसे अहम पद भी इसी तरीके से भरे जाएंगे. ISI चीफ लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक अक्टूबर में रिटायर होने वाले हैं, लेकिन सूत्रों के मुताबिक उन्हें भी एक्सटेंशन देने की चर्चा चल रही है ताकि सिस्टम में कंटिन्यूटी बनी रहे.
इमरान खान पर भी हो गया फैसला
बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का मुद्दा भी उठा. अंदर की खबर है कि लीडरशिप ने साफ कह दिया है कि इमरान खान को किसी भी तरह की राहत या पॉलिटिकल स्पेस नहीं मिलेगा. मौजूदा हुकूमत और फौज उन्हें एक अस्थिर करने वाली ताकत मानते हैं और कानूनी रास्तों से ही उन्हें पूरी तरह किनारे करने की रणनीति बना रहे हैं. हालांकि, विपक्ष भी पीछे हटने को तैयार नहीं है. इमरान खान की पार्टी पीटीआई और उसके सहयोगी दल आर्मी चीफ के एक्सटेंशन को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह फैसला फौज की दखलअंदाजी और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की अवहेलना है.












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