आस्था की परिक्रमा -चतुर्थ दिवस

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आस्था की परिक्रमा -चतुर्थ दिवस

(युगाधार समाचार )

सीतापुर -परिक्रमा की दृष्टि से आज का यात्रा मार्ग सबसे छोटा मार्ग है ,वैसे तो यात्रा प्रतिदिन औसत 8 कोस की दूरी तय करती है ,लेकिन आज ये मार्ग इसका आधा करीब 4 कोस ही है ,इस नाते रामादल आज दोपहर होते होते ही अपने चौथे दिवस के पड़ाव गिरधरपुर उमरारी पहुंच गया है ,और लगातार तीन दिनों से चलने के बाद परिक्रमा दल को अपेक्षाकृत विश्राम करने का अधिक अवसर मिल गया है ,
आज सुबह कोथावा मे स्नान करने के बाद रामादल ने कुछ ही वर्ष पूर्व गांव मे प्रकट हुए श्री बालाजी महाराज के दर्शन किये और फिर पश्चिम दिशा की ओर अपने आज के गँतव्य गिरधरपुर उमरारी के लिए सफऱ आरम्भ हुआ ,हम कुछ ही दूर चले कि बेले बाबा का एक सिद्ध स्थान मिला जहा बड़ी संख्या मे लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराते और माड़ खिलाकर अन्नप्राशन् कराते है ,कुछ लोग तो कोठावा की जगह अपना तीसरा यानी बीती रात का पड़ाव भी यही करते है और उनकी यात्रा स्नान ध्यान के बाद यही से आरम्भ होती है ,यहा से आगे बढ़कर कोरोकला गाँव होते हुए परिक्रमा दल सीतापुर बालामऊ रेलवे लाइन को क्रॉस करता हुआ जमुखिया के पास नहर पुल को क्रॉस कर उगपुर गाँव पहुँचता है ,ये गाँव अत्यंत प्राचीन बस्ती होने का प्रमाण मिलता है ,जिसका बड़ा उदाहरण यहा मिट्टी के बर्तनो का बड़े पैमाने पर काम होना है ,क्षेत्र मे आज भी सामान्य तौर पर लोगो के यहा मिट्टी के बर्तन ही मिलते है ,हम आगे बढ़ रहे है आटवा मुठिया रेलवे स्टेशन को पार कर हम परिक्रमा पड़ाव क्षेत्र् मे पहुंच जाते है ,आज तो यात्रा का कुछ पता ही न चला ,एक तो दूरी भी कम थी दूसरे रास्ते मे ठहराव भी कम था ,ऐसे मे आज पड़ाव पर् पहुंच कर अपना ठिकाना तलाश कर आज भोजन भी जल्दी तैयार होना है जिससे आज साधु संतो के पंडालो मे जाकर उनके दर्शनो का पर्याप्त अवसर मिल सके ,इस पड़ाव क्षेत्र मे छोटी छावनी अयोध्या की इतनी अधिक सम्पत्ति है कि इसकी प्रसिद्धि अयोध्या क्षेत्र मे काफी है और लोग उसी श्रद्धा भाव से इस स्थल को देखते है ,गिरधरपुर उमरारी दो नामो से मिलकर बनी है और इन दोनो नामो को लेकर अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण कथा है ,पुराणों के अनुसार त्रेता युग मे भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती जब विहार के लिए निकले तो राह मे मानव रुपी राम को प्रणाम करने पर् पार्वती माता ने उन पर सवाल खड़े करते हुए परीक्षा की बात कही और भोलेनाथ को बताये बिना सीता का रूप रखकर राम के सम्मुख गई ,राम ने उन्हे पहचानते हुए प्रणाम किया और कुशलता पूंछी मा पार्वती इससे शर्मिंदा हुई और भोलेनाथ की बात पर् भरोसा न करने का पछतावा हुआ ,इस बात को लेकर माता पार्वती और भोलेनाथ के मध्य कहासूनी और रार हुई ,उमा की इसी रार के कारण ये जगह उमारारी कहलाई जो बाद मे उमरारी के रूप मे जानी गई ,इस स्थल पर एकांत स्थान पर मा पार्वती की साधना स्थली है जिसे शक्ति धाम के रूप मे जाना जाता है ,पुराना इलाका ये उमरारी था जिसमे गिरधरपुर बाद मे जुड़ा जिसके संबंध मे कहा जाता है कि मीराबाई ने जहर का प्याला पीने के बाद तीन दिनों तक यहा सत्संग किया था ,और भगवान गिरधर गोपाल की महिमा को बखान करते हुए तीन दिनों तक बिना अन्न जल ग्रहण किये कृष्ण नाम जाप किया ,तब निबोह बाबा नामक एक संत ने मीराबाइ की सेवा की थी उन निबोह बाबा का भी स्थान यहा निर्मित हुआ और ये पूरा इलाका उमा की रार और मीरा की कृष्ण भक्ति के रहते गिरधरपुर उमरारी कहलाई,
गिरधरपुर उमरारी पड़ाव का क्षेत्रफल बरौली भसेन गांव से लेकर आस पास के कई गाँवो तक फैला है जहा छोटी छावनी का बड़ा प्रभाव है ,कुछ संत तो सारीपुर गांव मे ब्रम्हचारी बाबा के स्थान पर् भी विश्राम करते है ,यहा वन क्षेत्र और प्राकृतिक दृश्य काफी नयना भिराम है ,
चलिए आज रात पूरी तरह् से खुद को भगवत भजन के लिए समर्पित करते है आज दूरी कम थी तो थकान भी कम है वैसे भी आस्था मे थकान कहा ,,चलिये चलते है कुछ कथा पंडालो मे ,कल की यात्रा फिर लम्बी होगी और हरैया की तरह गोमती के तट पर् भी ,
श्री राम जय राम जय जय राम
( आभार – आराध्य शुक्ला )

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