आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा — सातवा पड़ाव

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आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा — सातवा पड़ाव

( युगाधार समाचार )

सीतापुर -84 कोसीय परिक्रमा के छठे पड़ाव देवगवा मे गुड़ कटोरा दान कर परिक्रमार्थी आज सुबह् ही अपने सातवे पड़ाव के लिए निकल पड़े ,रास्ते मे पड़ने वाले गाँवो के लोगो ने अपने दरवाजो पर इन श्रद्धालुवो के स्वागत के लिए तरह तरह के इंतजाम किये थे ,इन स्वागतो को स्वीकार करते हुए परिक्रमार्थी बर्मी की तरफ आगे बढ़ते है

, बर्मी पहुंचने से पूर्व परिक्रमार्थियों ने वाल्मीकि कूप और मंदिर के दर्शन किये ,माना जाता है महर्षि वाल्मीकि ने यहां पर पड़ाव किया था ,यहा से कुछ आगे बढ़ने एक बर्मी गांव का शानदार अमृत सरोवर और गौशाला बड़ी नयानाभिराम है और श्रद्धालु इसको देखना नही भूलते ,बर्मी होकर सीतापुर हरदोई मार्ग को पार कर रेलवे क्रॉसिंग से होते हुए परिक्रमा चंद्रावल इलाके मे प्रवेश करती है ,ये जगह भी आज के पड़ाव स्थल का एक हिस्सा ही है ,यहा चंद्रबदनी देवी ,बाबा छेदादास ,सुखतला धाम के साथ रामजानकी और संकट मोचन के दर्शन कर यहा चंद्र चंदरनी और चंद्रावल देवी मंदिर के भी दर्शन करते है ,यहा से ही परिक्रमा का ठहराव आरम्भ हो जाता है और जिला पंचायत ने इस बार दिव्य व्यवस्था कर इस पड़ाव को और महत्वपूर्ण बना दिया है ,,यहा पर राम ताला तीर्थ है जहा श्रद्धालु पहुंचकर आचमन करते है और कल प्रातः यही स्नान कर आगे की यात्रा आरम्भ करेंगे , इस स्थल का परिक्रमा मे बड़ा महत्व है जिसे मांडव ऋषि की तपोस्थली माना जाता है ,मांडव ऋषि की प्रतिमा और मांडव कूप यहा के सबसे प्रमुख स्थल है ,
मांडव ऋषि के संबंध मे कथा है कि इस मांडव वन मे मांडव ऋषि तपस्या करते थे ,यहा के राजा मद्रांचल के राज्य मे चोरी हो गई , किन्तु चोर भय के रहते ऋषि के आश्रम मे सारा धन रखकर गायब हो गये ,सिपाहियों ने मांडव ऋषि से चोरो के संबंध मे पूँछा तो वो वो चुप रहे ,उन्हे राजा के सामने लाया गया , राजा ने ऋषि को फांसी दी लेकिन फिर भी उनकी तपस्या भंग न हुई ,जिसे देख राजा भी उनके समुख नतमस्तक हो गया और ये पूरा क्षेत्र मांडव ऋषि की तपोस्थली के रूप मे जाना गया ,परिक्रमा के सारे पड़ावो मे ये सबसे रामणिक स्थल है जो अत्यंत अध्यत्मिक अनुभूति देता है ,
परिक्रमा इस पड़ाव से अपने अंतिम चरण मे पहुंचना आरम्भ होने लगती है ,इस नाते इस स्थल पर लोटा डोरी दान की परम्परा वर्षो से चली आ रही है और परिक्रमार्थी आज भी इसका पालन करते है ,सम्भव है प्राचीन काल मे पानी की किल्लत इस पड़ाव के बाद कम होती हो इस नाते यहा लोटा डोरी दान की परम्परा रखी गई कियुकी परिक्रमार्थी को अप्रग्राही भी होना चाहिए यही श्रद्धा है ,इसी कारण कल सुबह रामा ताल मे स्नान कर और लोटा डोरी पुरोहितो को दान कर हम आगे बढ़ेंगे ,आज रात मांडव ऋषि प्रतिमा और मांडव कूप के दर्शन और मांडव वन मे ही रात्रि विश्राम
जय जय सीताराम
( आभार – आराध्य शुक्ला )

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