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आस्था की84 कोसीय परिक्रमा –आठवा पड़ाव
( युगाधार समाचार )
सीतापुर – आस्थाएं मानो दुश्वावारियों का अंदाजा ही नही होने देती ,नैमिष से परिक्रमा पर प्रतिपदा को निकले थे ,आज पूरे आठ दिन हो गये ,पता ही न चला ,ऐसा नही है कि मुश्किलें कम थी लेकिन परिक्रमा का उत्साह और हमारी सनातन से जुड़ी रहने की चाह ने किसी भी मुश्किल का कभी एहसास ही न होने दिया अब तो कल फिर वापस नैमिष पहुंचने का समय आ रहा है ,हालंकी परिक्रमा तो अभी पूर्णिमा तक बाकी है ,लेकिन नैमिष तक कल पहुंचने के बाद वो अंदरूनी परिक्रमा का हिस्सा होगी ,
फिलहाल तो बीती रात मंदरुवा मे रात्रि विश्राम के बाद आज भोर मे ही रामताल मे स्नान कर ,लोटा डोरी का दान कर हम आगे की यात्रा पर् निकल लिए ,मार्ग मे बड़रावा के कई प्राचीन मंदिरो का दर्शन कर कभी धंधारी के जंगल रहे वन क्षेत्र से हम गुजरते है हालंकी अब यहा बस्तिया हो गई है और मछरेहटा तक वन क्षेत्र दूसरे मार्ग् पर् पड़ता है ,लेकिन मछरेहटा से जरिगवा के मध्य इसका हिस्सा अवश्य पड़ता है ,ये जंगल एक दौर मे इतना बिहाड़ क्षेत्र होता था कि लोग दिन मे भी निकलने का साहस न करते थे ,मान्यता है महर्षि दधीचि ने जब अपनी अस्थियो का दान किया तो गायो से अपने शरीर की खाल को अलग कराने का कार्य किया था ,उन गायो का ही ये क्षेत्र जंगल था जो कालांतर मे “धेनुधारी ” रहा होगा जो बिगड़ते बिगड़ते बाद् मे “धंधारी ” कहा जाने लगा ,इस इलाके से बढ़ते हुए हम मछरेहटा की आबादी मे पहुंचते है ,गंगा जमुनी संस्कृति की ये धरती गौ रक्ष पीठ से जुड़े स्वामी मत्स्येन्द्र नाथ की तपोस्थली मानी जाती है ,यहा के वनो मे बैठकर उन्होंने कठिन तप किया इसी के निकट धेनुधारी वन भी था इस नाते बाद मे उन्होने गो रक्ष पीठ की भी स्थापना की ,इस तरह अगर देखा जाए तो वर्तमान मुख्यमंत्री जी गोरख पीठाधिस्वर का सीधा संबंध इस स्थल और इस परिक्रमा से जुड़ता है ,कस्बे के कई प्राचीन स्थलों से होती हुई परिक्रमा कुनेरा के कैलाश तीर्थ से तमाम निर्जन क्षेत्रो से होती हुई आज के अपने पड़ाव स्थल “जरिगवा ” पहुँचती है ,जरिगवा के संबंध मे मान्यता है कि नैमिष जाते समय भगवान राम ने इस स्थल पर जल पिया और जल की कुछ बूँदे जमीन पर गिर गई जिससे माहेश्वर तीर्थ की स्थापना हुई ,शायद यही कारण है कि पिछले पड़ाव पर परिक्रमार्थी लोटा डोरी का दान कर देते है और प्राचीन परम्परा का पालन करते हुए यहा जल मांगकर ही पीते है ,यहां पर की गई जलसेवा का बड़ा महत्व है , जल गिरने के पश्चात प्रभु राम ने यहां पड़ाव भी किया था और श्री सिद्धेश्वर महादेव की स्थापना की ,
पुरानी मान्यताओं और जानकारियों के मुताबिक जरिगवा क्षेत्र महुवा का बहुत बड़ा वन क्षेत्र था ,धीरे धीरे वन तो समाप्त हो गया , इसी मे महर्षि माहू का आश्रम था ,जो अत्यंत तपोनिष्ठ थे ,यहा अभी भी एक दो सौ साल पुराना महुवा ही पेड़ है जिसे उस काल का प्रतीक मानकर उसकी पूजा अर्चना की जाती है ,आज इस स्थल को महुवा ठाकुर स्थल के रूप मे जाना जाता है,महुवा ठाकुर का ये स्थल जो महर्षि माहू का आश्रम था यही प्रभु राम ने निवास किया और मौनेश्वर तीर्थ की स्थापना की ,जहा मौन रखकर स्नान करने का विशेष फल प्राप्त होता है ,इस स्थल पर् कल्याणेश्वर मंदिर ,विष्णु आश्रम ,राम जानकी और हनुमान मंदिर भी है जो सब अत्यंत प्राचीन है ,
लेकिन ये पूरा पड़ाव स्थल अव्यवस्था का शिकार है,महेश्वर तीर्थ कूड़े का ढेर बना हुआ है तो कल्याणेश्वर मंदिर का चबूतरा टूटा हुआ है ,परिक्रमा क्षेत्र के तमाम क्षेत्रो की तरह यहा के भी प्राचीन स्थल समाप्त होने की कगार पर है अगर समय रहते इनका संरक्षण न किया गया तो ये सब महज इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएंगे ,यही नही इस पड़ाव स्थल पर स्थान का भी बड़ा अभाव है ,जिसके रहते परिक्रमा पांच किमी के दायरे है कुनेरा ,मल्हपुर ,सूरजपुर ,आटवा,शेखपुर और जोगियाहार तक रूकती है ,सालो साल जगह की किल्लत बढ़ती जा रही है लेकिन प्रसाशन कभी संवेदनशील नजर नहीं आता कियुकी सरकारी सिस्टम की वाह वाह करने वाले बड़े नाम वाले लोगो को तो जगह प्रसशन दे ही देता है ,
मंजिल के करीब इम्तहान भी बड़े होते है ,हम् कल नैमिष पहुंचेंगे तो आज कुछ मुश्किल तो होनी ही है लेकिन बोल कड़ा कड़ सीताराम मे कैसी मुश्किल ,आज रात यही कल आगे का सफऱ ,
याद करिये नैमिष के बाद पहला पड़ाव था ‘करोना “और नैमिष के पहले आखिरी पड़ाव है ” जरिगवा “और ये सनातन की ही तो ताकत थी जो भारत मे करोना जरि गवा ,
जय सीताराम
(आभार – आराध्य शुक्ला )












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