आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा –छठा पड़ाव

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आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा –छठा पड़ाव

( युगाधार समाचार )

सीतापुर -परिक्रमा के पांचवे पड़ाव स्थल साक्षी गोपाल जी की साखी (गवाही )ने मानो हमारी आस्था पर पक्की मोहर लगा दी और किसी सनातनी की धार्मिक यात्रा के साक्षी स्वय प्रभु बन जाये इससे सुखद उसके जीवन मे भला क्या होगा ,बीती रात हरदोई जनपद मे विश्राम की अंतिम रात थी ,इस दौरान अनगिनत तीर्थो और ऋषि जनो के आश्रमो के दर्शन कर हम फिर आदि गंगा गोमती के तट पर आ गये है ,ये संयोग ही है जिस दिन सीतापुर जनपद की सीमा को छोड़ हमने हरदोई की सीमा मे प्रवेश किया था (हरैया पड़ाव ) तब भी हमने मा गोमा के पाँव पखारे थे और आज फिर हम गोमा मैया को प्रणाम करके सीतापुर जिले मे दाखिल हो रहे है ,हरदोई के तौकलपुर गांव होते हुए हम गोमती के तट पर आ गये जिसे द्रोणाचार्य घाट के नाम् से जाना जाता है ,मान्यता है गुरु द्रोण जब आये थे तो उन्होंने इसी स्थल पर निवास किया था ,ये परिक्रमा का परम्परागत मार्ग है और परिक्रमार्थी पैदल या नाव के जरिये यहा गोमती पार करते है ,हलंकी कुछ वर्ष पूर्व दधनामऊ घाट निर्मित हो जाने से लोग पुल के जरिये गोमती पार जाकर आज के पड़ाव के लिए जाते है लेकिन वो परम्परागत मार्ग नही है इस नाते अस्थावान लोग उस् मार्ग को नही अपनाते ,इस बार वैसे भी ट्रेक्टर ट्रॉली कम होने से नदी को पैदल या नाव के जरिये पार करने का उत्साह अधिक है ,हलंकी प्रशशन फिर नाव की पर्याप्त और उचित व्यवस्था करा पाने मे असफल साबित हुआ है ,हम गोमती स्नान कर और पार कर अब द्रोणाचार्य घाट से सीतापुर जिले मे आ गये है और दधनामऊ ग्राम पंचायत के गांव मधुबना पहुंचते है जहा कई प्राचीन मंदिर हमारी आस्था का बड़ा केंद्र है ,यहा से हम लोहारखेड़ा गाँव पहुचे ,यहा कुछ वर्ष पूर्व आर एम पी पी जी कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर् जयवीर सिंह ने माता जी का भव्य धाम निर्मित करा कर इसको सुर्खियों मे लाने का काम किया है ,इस दौरान यहा विशाल् यज्ञ और भागवत कथा का आयोजन हो रहा है ,श्रद्धालु उस भक्ति गंगा मे अवगाहन कर और प्रसाद प्राप्त कर आगे भुलभूल पुरवा पंचायत के गांव तेजीपूर्वा होते हुए आज के अपने पड़ाव देवगवा पहुंचते है ,जो सुरमय वाटिकाओं का क्षेत्र है जो प्राचीन काल मे विस्तृत अरन्य क्षेत्र रहा था ,यहा कई प्राचीन देवालय है वही कई नये मंदिर भी स्थापित हुए है ,जो सभी प्रमुख देवी देवताओं के है,इस पड़ाव की सबसे प्रमुख विशेषता यहा गुड़ कटोरा का किया जाने वाला दान है ,हर परिक्रमार्थी अनिवार्य रूप से यहा पर् कटोरा दान करता है और पात्र कभी रीता दिया नही जाता इस नाते उसमे गुड़ भरकर देने का रिवाज़ है ,सम्भव है इस पड़ाव के आगे क्षत्रिय राजाओं के सभी प्रमुख स्थल पड़ते है इस नाते ये परम्परा बन गई हो कि यहा से आगे परिक्रमार्थियों के भोजन का प्रबंध अब ये दानवीर स्वय करेंगे इस नाते अब पात्र की कोई आवश्यकता नही इस नाते इसका यही दान कर दे ,गुड़ कटोरे का दान कर आज रात्रि यही भगवत भजन करते हुए हम कल भोर मे अपने अगले पड़ाव की यात्रा आरम्भ करेंगे हलंकी इस पड़ाव पर् सबसे कम स्थान उयलब्ध होने के नाते कुछ परिक्रमार्थी यहा पूजन अर्चन कर अगले पड़ाव के लिए भी निकल लेते है या मार्ग के किसी अन्य स्थान पर डेरा जमाते है ,लेकिन अपने राम का भगवत भजन तो निर्धारित पड़ाव देवगवा है ही ,
बोल कड़ा कड़ सीताराम
( आभार – आराध्य शुक्ला )

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