आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा – दसवा पड़ाव

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आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा – दसवा पड़ाव

( युगाधार समाचार )

सीतापुर -84 कोसीय परिक्रमा के दसवे पड़ाव को लेकर अजीब विडंबना है ,पंच कोसीय परिक्रमा के मिश्रीख पड़ाव तक पहुंचने की जल्दबाजी या यू कहे मिश्रीख पड़ाव के सिमटते आकार के रहते लोग नैमिष से सीधे मिश्रीख पहुंचने की जल्दी मे रहते है ,जिसके रहते वो निर्धारित दसवे पड़ाव ‘कोल्हुवा बरेठी “की अनदेखी कर देते है ,कुछ साधु संत ये मानने लगते है कि नैमिष वापसी के साथ उनकी परिक्रमा तो पूर्ण हो गई अब श्रद्धालु संतो की परिक्रमा करेंगे ऐसे मे जल्द से जल्द मिश्रीख पहुचा जाये ,एक तथ्य ये भी है कि मिश्रीख मेले का औपचारिक उद्घाटन आज ही होता है ,ऐसे मे फोटोजीवी और प्रसाशन के नजदीक दिखने की चाह रखने वाले संत भी नैमिष से सीधे मिश्रीख पड़ाव डाल देते है ,लेकिन हमको आपको इनमे से किसी का लोभ है नही तो आइए हम आप पूरी यात्रा के सहभागी बनते है ,
बीती रात नैमिष पड़ाव मे भगवान नैमिष नाथ की शोभा यात्रा ,आरती और चक्र तीर्थ की अष्ट कोणीय आरती के मध्य आधी रात का समय हो गया ,पूरे नैमिष मे उत्सव सरीखा माहौल था तो हर्ष और आनंद के इन पलो के मध्य समय का तो भान ही न रहा ,यात्रा की थकान तो अवश्य थी लेकिन आस्था ने पूरी रात भगवत भजन मे ही लगाए रखा
आज प्रातः मा गोमती के दर्शन कर हमने मा ललिता देवी के दरबार के दर्शन किये ,मा ललिता के यहा प्रकट होने को लेकर कई तरह ये कथाये है (जिनके बारे मे पूर्व मे कई बार विस्तार से लिख चुका हु अगर आप पुनः पढ़ना चाहे तो नवरात्रि मे फिर पढ़े ) इसके बाद परिक्रमार्थियों ने मंदिर के निकट स्तिथ पंच प्रयाग के दर्शन किये ,मान्यता है महर्षि दधीचि के संकल्प को पूर्ण करने के लिए देवताओं के आवह्न् पर सभी तीर्थ तो यहा आ गये लेकिन तीर्थराज प्रयाग स्वय के तीर्थ राज होने के मद मे न आये तब देवताओं ने यहा पंच प्रयाग की स्थापना की ,हालंकी ये महत्वपूर्ण स्थल दुर्दशा का शिकार है ,प्रसाशन ने इस महत्वपूर्न् मौके पर भी इसकी सफाई कराने या जल भरने की आवश्यकता अनुभव नही की ,परिक्रमा अब नैमिष से निकल रही है ,स्वामी नारदानंद जी का आश्रम जिन्होंने आधुनिक नैमिष को दुनिया मे पहचान दी ,वहा और देवपुरी होते हुए हम भोलेनाथ के सिद्ध दरबार “देव देवेश्वसर ” पहुंचते है ,मान्यता है इस स्थल की स्थापना स्वय वरुण देव ने की थी ,अरन्य मे स्तिथ ये अत्यंत रमनीक स्थल है ,यहा कल्पवासी भी प्रवास करते है और नियमित रामायण का भी यहा पाठ होता है ,हाल ही मे यहा गोमती तट पर् नवीन घाट भी निर्मित हुए है जो इसकी शोभा को और बढ़ाते है ,कुछ लोग यहा से गोमती पार “ब्रम्हावर्त्त ” तीर्थ भी जाते है ,जहा विशाल शिवलिंग है ,कुछ वर्ष पूर्व ही इस स्थल का विकास हुआ है वरना अन्य तीर्थ की तरह जो यहा गोमती मे समाप्त हो गये ये भी भूमि के अंदर दबा हुआ था ,
देव देवेश्वर के दर्शन कर ठाकुर नगर होते हुए हम आस्था के एक ऐसे केंद्र पर पहुंचते है जहा चमत्कार के आगे विज्ञान भी नत मस्तक है ,रुद्रावर्त्त तीर्थ मे ॐ नम शिवाय की श्रद्धा के मध्य बिम्ब पत्र ही गोमती की जलधारा मे समा जाना एक चमत्कार ही तो है जहा विज्ञान हार जाता है ,गोमती और रेती का ये क्षेत्र जितना रमनीक है उतना ही आध्यत्मिक ऊर्जा का केंद्र भी ,यहा से फूलपुर झरिया और वन क्षेत्र होते हुए हम् आज के पड़ाव “कोल्हुवा बरेठी ” पहुँचते है ,मिश्रीख बहुत पास है मन करता है पड़ाव मिस्रिख् मे करे लेकिन अस्थाये हमे इस निर्धारित पड़ाव पर ही रोक लेती है ,जगन्नाथ जी का अत्यंत सिद्ध और प्राचीन मंदिर है यहा हम जिसके दर्शन करते है ,आज यहा जरूर रुकिए और राम रस धारा बहाइये वरना ये पड़ाव विलुप्त होने की कगार पर है ,
आज की रात यही राम नाम संकीर्तन होगा और कल चलेंगे अपने आखिरी पड़ाव मिश्ररीख के लिए(आभार)

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