आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा – ग्यारहवा पड़ाव( प्रथम दिवस )

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आस्था की 84 कोसीय परिक्रमा – ग्यारहवा पड़ाव( प्रथम दिवस )

( युगाधार समाचार )
सीतापुर -जब हम मंजिल के करीब पहुंचने को होते है तो स्वाभाविक् उत्सुकता और बेताबी बढ़ ही जाती है ,कोल्हुवा बरेठी के कल रात्रि के पड़ाव मे भी यही सब चल रहा था ,मिश्रीख मे जगह मिलेगी या नही आम श्रद्धालुवो की ये चिंता है तो साधु संत अपने मतहतो को ये हिदायत दे रहे है देखना पड़ोस वाला साधु बढ़ कर् न लगाने पाये ,कई बार पंडाल् लगाने की ये जंग काफी बढ़ जाती है ,बीती रात शाम होते होते ही कुछ मौसम बिगड़ने लगा तो परिक्रमर्थियों की धडकने बढ़ने लगी ,बीते दो सालो से प्रकृति काफी मेहरबान रही है ,वरना हर बरस इंद्र देव रामादल् का एक इम्तिहांन् तो ले ही लेते थे ,कल अधिकांश संतो और परिक्रमार्थियों का एकादशी का व्रत था ,आमलकी एकादशी का वैसे भी बड़ा महत्व है ,रात साबूदाना की खीर और उबले आलू का ही आहार अधिकांश पंडालो मे रहा ,और आज सुबह सुबह ही सब लोगो का परिक्रमा के अंतिम पड़ाव मिश्रीख आना शुरु हो गया ,हलंकी मिश्रीख मेला का प्रसाशनिक तौर पर उद्घाटन एकादशी को ही हो जाताहै ,और बीते बरसो मे संत एकादशी को ही मिश्रीख आ भी जाते थे ,लेकिन 84 कोसीय परिक्रमासमिति के प्रयासों के रहते अब दसवे और पौराणिक महत्व के पड़ाव कोल्हुवा बरेठी को जीवंत किया गया है,इस नाते अब लोगो का आना द्वादशी से ही आरम्भ होता है ,हलंकी परिक्रमा करने वाले 70 प्रतिशत लोग कल् ही मिश्रीख आ गये थे ,
आज संत महात्माओ के आगमन के साथ ही उनकी शाही सवारी निकलती है ,और वो अखाडा स्नान की तरह दधीचि कुड़ की तरफ् जाते है ,अधिकांश साधु संत के पंडालो मे आज भंडारा भी होता है ,
मिश्रीख ही वो स्थल है जहा बैठकर महर्षि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियो का दान किया था ,उन्होंने अस्थि दान से पूर्व सभी तीर्थोके जिस मिश्रित जल मे स्नान किया वो कुंड दधीचि कुंड और ये स्थल मिश्रित कहलाया ,
आज मेले मे भारी भीड़ है ,84 कोसीय परिक्रमा करने वाले लोगो की अपेक्षा इस अंदरूनी परिक्रमा मे श्रद्धालुवो की संख्या कई कई गुना बढ़ जाती है ,परिक्रमा यहा पांच दिवसीय पड़ाव करती है इस नाते जनसैलाब् और नजर आता है ,
आज कुछ थकान भी अधिक लग रही है ,चलिए थोड़ी दर विश्राम कर लेते है ,फिर शाम को पंचकोसीय परिक्रमा पर निकलते है तब तक धूप भी थोड़ी कम हो जाएगी ,
बोल कड़ा कड़ सीताराम !

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